जीवन अपने आप में प्रगतिशील है, ये लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. इसके पास पिछली बातो के लिए वक्त नही होता. हम बस जीवन में बहते है. और इसको एन्जॉय करने की कोशिश करते है. हमारा जीवन बस यही तो है. हम बस वो सब चाहते है, जो हमे ख़ुशी दे. साधारण रूप में कहे, तो जीवन आनन्द के खेल का ही तो हिस्सा है. जिसमे हम काफी ज्यादा मेहनत कर वो मुकाम प्राप्त करने की कोशिश करते जो हमे एक कामयाब व्यक्ति के रूप में दिखाए.
हाँ ये बेहद जरूरी है. कोई नही चाहेगा उसका जीवन अच्छा न व्यतीत हो. लेकिन हम कन्हा जा रहे है? इसको जीवन दर्शन कहते है… कंही हमारी यात्रा गलत जंगल में तो नही? या हम अपने को कंही और ही ले जा रहे है? बस हमे ये सोचना है, हम कौन है? और हमारी यात्रा का लक्ष्य क्या है?

जीवन की बुनियाद/

जीवन की बुनियाद क्या है? वो हमारी आन्तरिक प्रोग्रामिंग, अर्थात हमारा जीवन के प्रति नजरिया और लक्ष्य. ये जीवन की नीव का काम करती है. उस बुनियाद को धामे रखता है हमारा चरित्र… जब हमारे जीवन की बुनियाद सही है, तो हमारे कदम सही दिशा में बढ़ेगे.  अर्थात जीवन में अच्छा व्यवहार, सही समाज, उचित दृष्टीकोण, और उच्च लक्ष्य ये जीवन की सबसे प्रथम आवश्यकता होनी चाइये…

हमारा लक्ष्य अभेद होना ही परम आवश्यक है. अभेद लक्ष्य सही समज और तालमेल देता है. तालमेल अर्थात बुद्धि की निर्णय शक्ति. जिससे लक्ष्य को प्राप्त करने में आसानी रहती है. अभेद लक्ष्य, जो अंतिम और रियलिटी पर बेस्ड हो. ऐसा लक्ष्य, जो सदा एक सम्मान, अप्रवर्तनीय और उंच हो. जिस पर निगाह टिकते ही बस और कुछ न याद रहे. ऐसा लक्ष्य जीवन परिवर्तक होता है.

जीवन दर्शन में इसका बेहद महत्व है. यंहा चेक करना होता है. क्या मेरा लक्ष्य सही है? क्या मेरे जीवन की यात्रा एक सही दिशा में जा रही है? या इसमें कुछ त्रुटी है..? वो क्या है…? वो सब स्वय से पूछना होता है… जब हम जीवन दर्शन और स्व चिंतक के रूप में स्वयं को तैयार करते है. तो वो स्व चितन ही खुद की कमजोरी को दूर करने का एक मार्ग बतलाता है… उसमे स्वयं के लिए सही समज तैयार हो जाती है…

जीवन दर्शन के नियम

जीवन को देखना एक प्रक्रिया है… जब हम पास्ट की यादो में जीवन को देखने का प्रयत्न करते. तब ये उस हिसाब से नही दीखता, जो वस्व्त्व में होता है. वो देखने में और वर्तमान की स्थिति में देखने में फर्क हो जाता है. पास्ट के रूप में देखने से वर्तमान का रूप अलग होता है. क्योंकि वंहा बनी तस्वीरे मिलावट पर आधारति होती है. जो रियलिटी नही होती. जब हम वर्तमान का दर्शन कर स्वयं को समजते है. तो वो सही में हमारी स्थिति होती है.

वो “में हूँ” ये सोचकर जब हम अपने दर्शन को देखते है. तो जीवन अच्छा बन जाता है. में कौन की पहली? ये सबसे जरूरी रोल अदा करने वाली होती है. क्योंकि इसी में सम्पूर्ण जीवन दर्शन और यात्रा का सार छुपा हुआ है. में कौन की पहली में ही, सारा जीवन है… और यात्रा का चित्रण भी यही पहली करवा देती है…

समाजिक जीवन शैली

जीवन दर्शन में सामाजिक जीवन दृष्टि के नियम होते है. ये जीवन दर्शन अपने आप को वो चीजों से दूर कर देता. जो समाज के लिए उचित नही होती. समाज किस तरह के व्यवहार से आहत और खुश रहता है. वो जीवन दर्शन से जान सकते है. खुद को जानने की यात्रा से मन को एक ठहराव मिलता है. जो सामजिक जीवन शैली में बदलाव लेकर आता है.

समाजिक रूप से जब हम बदलाव लेकर आये, तो उसका आधार भी स्वयं पर कण्ट्रोल होना चाइये.  जब हम जीवन दर्शन को अपनाते है. तो हम स्वयं की कमजोरी को कम करने के लिए भी प्रयत्नशील होते है. स्वयं की कमी को दूर करने का आधार है, स्व दर्शन, खुद को जानना. इससे मन में क्या चल रहा है. संस्कार क्या है. उसका हमे मालूम चलता है.

जो समाजिक जीवन शैली के लिए काफी फायदेमंद, और अद्भुत रूप से कार्य करती है. समाजिक जीवन दर्शन से हम अपनी आन्तरिक शक्ति को कमजोर करते है. क्योंकि वो हमारी बहार से भीतर की स्थिति को बनाने वाली होती है. स्व दर्शन से हम समाजिक जीवन शैली को समज उस अनुसार अपनी शैली का निर्माण करते है.

उस अनुसार जब हमारी शैली बनती है, तो हमारे भीतर की जागरूकता पूर्ण शांति के शक्ति, और अन्य शक्ति का जागरण होने लगता है. हम उस समाजिक दृष्टिकोणों से ऊँचा उठ जाते, जो केवल बहार के परिवेश से उत्पन होती है. वो हमारे भीतर के असली स्वरूप को जानने के लिए प्रेरित करती है… स्व दर्शन ही हमारा असली स्वरूप हमे बतला देता है.

स्व दर्शन के लक्ष्ण

स्व दर्शन, अनेको दर्शनों का नाश करता है.  ये अनेको चक्रो से हमे बचाने का कार्य करता है. स्व दर्शन अर्थात आत्मिक दर्शन, जिसमे हम अपनी आत्मिक स्वरूप की स्थिति को प्त्यक्ष करने का प्रयत्न अपने सामने करते है. स्व दर्शन तकनीक में हम अपनी जागरूकता से अपने निज स्वरूप आत्मिक स्वरूप को य्र्थार्ट जान उसका दर्शन करने का प्रयत्न करते है.

इस आत्मिक स्वरूप को हम आदि से लेकर अंत तक का सफर तय करते है. ये कल्पना के रूप में होता है, जिसमे हमारी चेतना उस तरफ जाती है. जन्हा से हम आये थे. हम एक आत्मा है… और हम परमधाम से इस धरा पर पार्ट बजाने के लिए आये है… हम सब का पार्ट अलग अलग है. ये लक्ष्ण है उस आदि स्वरूप का जानने का..

जब आत्मा आती है, तो सम्पूर्ण पवित्र, सम्पूर्ण निर्विकारी, सम्पूर्ण होती है… स्वदर्शन का मतलब ही है अपने उस स्वरूप को याद करना. आत्मा एक दो नही, उतने जन्म लेती है. जितने से वो यंहा आती है. एक आत्मा ८४ जन्म से लेकर, १ जन्म तक भी लेती है. कुछ अत्म्याए, पुरे ८४ जन्म लेती है. तो कुछ ८ ९ १० भी…

जब वो इस धरा में आती, तब से लेकर उनका क्या पार्ट रहा? वो सब स्व दर्शन का हिस्सा बनता है. स्व दर्शन अर्थात में कौन का? दर्शन…

स्व दर्शन के लक्ष्ण, नियम, मर्यादा, और पालना है. नियम रोजाना स्वयं को देखना, स्वयं से बात करना, स्वयं के लिए जागरूकता प्राप्त करना, मर्यादा, शुभ भावना, शुभ विकास, अपने पापो के लिए सभी से माफ़ी मांगना, शुद्ध आहार, शुद्ध वृति, शुद्ध कृति, सब शुद्धता के साथ हो. ऐसा जीवन ही शुद्ध जीवन की दिशा में कदम है…

लक्ष्ण और लक्ष्य दोनों एक से ही प्राप्त होते है. जब लक्ष्ण सही होगे, तो लक्ष्य आपे ही सही हो जायेगा… लक्ष्ण की परिभाषा है, जो दिखाई दे… जिसमे मन लगे… जो साधना का हिस्सा बने, लक्ष्ण है…

 

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