bhagya ko kaise bnaaye? bhagya kya hai? bhagya ko ham kaise bna skte hai? bhagya ki pribasha? bhagya ko kaise behter bnanya ja skta hai?

सोये हुए भाग्य को जगाने के लिए हम क्या क्या नही करते.? पंडित लोगो की बताई गयी अनेक बातो को जीवन में धारण कर लेते है. परन्तु फिर भी भाग्य कभी कभी जगता नही. गाय को रोटी खिलाई, काले कुते को रोटी खिलाई. लेकिन फिर भी भाग्य जगा नही. उल्टा और नुकसान हो जाता है. जितना भाग्य बनाने जायो, उल्टा दुःख ही अंतिम में हाथ लगता है.

एसा क्यों होता है? क्या हम सच में भाग्य बना रहे. या हम धोखे में स्वयं को रखते है? एक बात जो हमे समजने की जरूरत है. वो हमारे कर्म हमारा भाग्य बनाते है. जो हम गाय को रोटी खिलाते है, वो क्या हुए? जरुर हमारे कर्म हुए. उन कर्म से क्या होगा? उससे हमारे भीतर एक भाव पैदा हो जाता हाँ मैंने ये कर लिया. पंडित जी ने कहा था, अब मेरा वो कार्य सम्पन्न हो जायेगा.


तो आपका असली कर्म क्या था? आपका असली कर्म वो संकल्प था, हाँ मैंने ये कार्य कर दिया, अब मेरा काम हो जायेगा. वो भाव अंदर में एक संतोष पैदा करता है. यदि हम ऐसे ही संकल्प करे, कि मेरा वो कार्य हो जाता. तब वो कार्य क्यों नही होता? जबकि पंडित जी द्वारा बताये उपाय से वो कार्य हो जाता है? ऐसा फिर क्यों होता है? तो इसका जवाब है, जब हम स्वयं वो संकल्प करते, तब हमारे भीतर वो विश्वास आता नही. जो किसी सम्मानित व्यक्ति द्वारा सुनकर हम करते है.


soya hua bhagya jagaye? soye hue bhagya ko jagya

क्या आपने कभी सोचा है, जो व्यक्ति कुछ भी कर्म कांड नही करते. वो व्यक्ति ज्यादा सफल क्यों होते है? क्योंकि उस व्यक्ति की सफलता बहार से नही आती. उसके अंदर से उसके आत्मविश्वास से आती है. जब हम कर्म कांड में भरोसा रखते है. तो हमारे भीतर क्या परिवर्तन होते है.

  1. हम शंकालु हो जाते है. हर व्यक्ति पर हम शंका करेगे. क्योंकि हम अनुमान करते रहते है. अब ये होगा, ये होगा. अब ये होने वाला है. ये अनुमान हर व्यक्ति को उसी नजरिये से देखता है.
  2. हमारा विश्वास बहार से आएगा. और बहार के जीवन से ही हम अपने भीतर में बदलाव लेकर आते है.
  3. चित में कभी शांति होगी नही, बुद्धि की शाखा पर्शाखा होगी. क्योंकि कई तरह के विश्वास बैठे है. जिससे बुद्धि एक चित हो नही पाती..

अब इसका निवारण है, स्वयं को स्वयं ही हर चीज़ के लिए जिमेवार ठहरना. यदि भाग्य बनाना है. तो कर्म की शुरुवात हमारे सोच से होती है. जैसी सोच होगी, वैसा हमारा अंतिम में भाग्य बनेगा. ऐसा क्यों होता है, तो आईये समजते है.

हम सोचते कैसे है? चित्रणों के रूप में न, हर चीज़ को चित्रण करके सोचते है. और तर्क रूप में हर चीज़ को देखते है. दो तरह की सोच चलती है, एक तर्क की दूसरी चित्रं की, दोनों ही एक दुसरे से विपरीत है. जन्हा तर्क में हम बातो को परखते है. तर्क अच्छा लगा तो अपनाते है. और चित्रण में हमे उसकी क्लेअरिटी होती है.

परन्तु एक हम परिभाषा सेट करते है. जैसे धन के मामले में किसी की परिभाषा हो सकती है … में बहुत सारा धन कमा, कर ये ये काम करुगा. फिर ये ये होगा. एसा करके फिर ये हो जायेगा. धन कमाना जरूरी है. धन नही कमाता तो घर नही चलेगा. अनेक तरह की परिभाषा अथवा बलिव हमारे मन में सेट रहते है.

अब यंहा सबसे जरूरी है हमारा बलिव और परिभाषा, अर्थात हमारी जीवन की स्क्रिप्ट, जैसी हम स्क्रिप्ट लिखते है. हम उसी तरह के तर्क और चित्रण अपने मन में चलाते. इसी स्क्रिप्ट से हम अपने कर्म भी लिखते है. स्क्रिप्ट में ही हमारा जीवन का लक्ष्य भी आ जाता है… इसीलिए स्क्रिप्ट सबसे जरूरी साधन है. ये सेल्फ कांफिदेस को भी बड़ा देती है.

अब जैसे धन के लिए एक स्क्रिप्ट है, में आवश्यक धन जीवन में कमाता हूँ. में धन सम्बधित हर जरूरत को पूर्ण करने के लिए पूरी तरह से समर्थ हूँ. मेरे जीवन में पर्याप्त धन है. धन मेरे लिए केवल आजीविका का एक साधन है. जो मेरी जरुरतो को पूर्ण करने और परिवार आदि पालन पोषण के लिए है. में धन को आकर्षित करता हूँ. ये एक स्क्रिप्ट का उदारण है.

जैसे कंप्यूटर की भाषा में भी स्क्रिप्ट ही सबसे जरूरी है. वैसे हमारे लिए भी स्क्रिप्ट ही जरूरी है. इसी स्क्रिप्ट पर हमारा पूरा जीवन चलता है. यदि आपके भीतर कोई गलत स्क्रिप्ट है. तो हम अपनी स्क्रिप्ट को परिवर्तन कर सकते है. और जीवन को फिर से पटरी पर ला सकते है.

जब हमारी स्क्रिप सही होगी. तब हमारे जीवन का हर प्रोग्राम सही चलेगा. यदि कोई तनाव वाली बाते है. तो समजो स्क्रिप्ट में खराबी है. तो स्क्रिप्ट को परिवर्तन करने की आवश्यता है. याद रहे ये स्क्रिप्ट आज के बाद कोई अन्य आपके लिए न लिखे. अन्यथा वो स्क्रिप्ट हमारे जीवन के लिए अच्छी नही हो सकती है. अपना जीवन की स्क्रिप्ट स्वयं लिखे.

आपका जीवन में सदा खुशियाँ आये, ये हमारी शुभभावना है. लेख पड़ने के लिए बहुत बहुत आभार.


Leave a Reply